साधनों की अधिकता के कारण लोग पुरानी परंपरा विस्मृत कर चुके हैं

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दयोदय में बोले आचार्य विद्यासागर

जबलपुर। आप लोगों को स्मरण होगा या हो सकता है कि कोई विशेष जानकारी न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान में साधनों की अधिकता के कारण लोग पुराना विस्मृत कर चुके हैं। गर्मी के समय में या अन्य ऋतुओं में भी शीतल पदार्थ जैसे बर्फ आदि का उपयोग लोग करते हैं। दूध हो या और कोई भी रस हो, आमरस बगैरह, उनमें पदार्थ डालने से वह जम जाता है।  जमाने के समय बर्फ में नमक भी डालते है , लगता है कि नमक के संपर्क में आते ही दूध फट जाएगा लेकिन सावधानी रखी जाती है कि नमक दे दूध की दुरी रहे।
उक्ताशय के उद्गार दयोदय तीर्थ की धर्मसभा में आचार्य विद्यासागर महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दूध न फटे इसके लिए लवण या अन्य नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों से दूर रखना चाहिए। ऐसा ही हमारा जीवन भी है कि उसे नुकसान पहुंचाने वाले ईर्ष्या-द्वेष आदि भावों से बचाना चाहिए। अच्छे के संपर्क से सुधार होता है, जबकि बुरे के संपर्क से बिगाड़ हो जाता है। जिस तरह बर्फ के संपर्क में दुध का सुधार होता है नामक के सम्पर्क में फट जाता है।
उन्होंने कहा कि केतली से पदार्थ वितरित किए जाते हैं। यह पुराना तरीका है।  केतली की धार जीवन मे एकाग्रता को इंगित करती है , अब भी लोग इसका प्रयोग करते हैं। लोग बड़े चाव से उसे उपयोग में लेते हैं। छांछ में नमक डाल देते हैं, वह स्वादिष्ट हो जाता है। नमक का मेरा तो त्याग है। स्वाद से कोई सरोकार नहीं। लोग कोरा नमक नहीं लेते। कुछ लोगों की ऐसी प्रतिज्ञा तक होती है। लेकिन वे नमक का त्याग नहीं करते हैं।
आचार्यश्री ने बताया कि नमक की डली को डालकर कोई पदार्थ जमाया जाता है। लेकिन वह नमक उपयोग में लेने लायक नहीं होता। भूल से नमक न डालें तो गड़बड़ हो सकती है। यदि भोजन में नमक कम हो तो परेशानी अधिक हो तो परेशानी। इसलिए संतुलन आवश्यक है। नमक का महत्व बताकर यह साफ किया जा रहा है कि भीतरी तप को अंगीकार करने के साथ-साथ नमक की भांति बाहरी तपों को भी अपनाया। सवाल उठता है कि क्यों? आभ्यंकर तपों की वृद्धि के लिए बाह्य तपों को भी नमक की भांति अपनाया है। यह महत्वपूर्ण नियम है। इसका पालन होना चाहिए।

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