क्या जल्दबाजी में है मोदी सरकार

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नागरिकता कानून: तर्कसंगत समाधान जरूरी
– मुस्ताअली बोहरा

नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर सहित देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। मुसलमानों के साथ ही बहुजन समान के लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं। कुछ राज्यों में तो हिंदू समाज का तबका भी प्रदर्शन में शामिल है। इस तरह के व्यापक विरोध का शायद मोदी सरकार को भी अंदाजा नहीं रहा होगा। जिस तरह से तीन तलाक, अनुच्छेद 370, अयोध्या मसले का समाधान हुआ उसी तरह इस कानून को लेकर ज्यादा शोर शराबा नहीं होगा, ये सोच मोदी सरकार की रही होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह मोदी सरकार की जल्दबाजी भी हो सकती है और हर चीज को धर्म के चश्में से देखने की भी। मालूम हो कि 12 और 13 दिसंबर की दरम्यानी रात को नागरिकता संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए और इसे क़ानून की शक्ल दे दी। 10 दिसंबर को लोकसभा में इस विधेयक पर लंबी चर्चा हुई जिसके बाद सदन में ये बहुमत से पास हो गया। 11 दिसंबर को विधेयक राज्यसभा पहुंचा और देर शाम जब ये पारित हुआ उस वक्त तक उत्तरपूर्व के असम, मणिपुर, त्रिपुरा में विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी। ये विरोध दिल्ली, मुंबई, औरंगाबाद, केरल, पंजाब, गोवा, मध्यप्रदेश समेत कई इलाकों तक पहुंच गया है। यहां बात दें कि नागरिकता संशोधन विधेयक को पेश करने के दौरान ही यानी 9 दिसंबर को मणिपुर को भी इनर लाइन परमिट में शामिल करने का प्रस्ताव किया गया था लेकिन हिंसा भड़कने के बाद ही इससे संबंधित दस्तावेज़ बने। 11 दिसंबर को अचानक मणिपुर में भी इनर लाइन परमिट व्यवस्था लागू करने संबंधी आदेश पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए। इनर लाइन परमिट एक तरह का यात्रा दस्तावेज़ है, जिसे भारत सरकार अपने नागरिकों के लिए जारी करती है, ताकि वो किसी संरक्षित क्षेत्र में निर्धारित अवधि के लिए यात्रा कर सकें। फिलहाल ये अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर में लागू है। इधर, भारत के हालात को देखते हुए बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन ने अपना भारत दौरा रदद कर दिया, साथ ही गृह मंत्री असदुज्जमां खान ने पूर्वोत्तर की अपनी निजी यात्रा निरस्त कर दी। जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे भारत आने वाले थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गुवाहाटी में उनकी मुलाक़ात होने वाली थी। आबे का दौरा 15-17 दिसंबर तक के लिए प्रस्तावित था मगर अंतिम वक्त पर इसे टाल दिया गया।
इन सब से ये माना जा रहा है कि मोदी सरकार को नागरिकता कानून को लेकर इतने तीव्र और व्यापक विरोध का अंदाजा नहीं था। इसकी वजह ये भी हो सकती है कि भाजपा हर चीज़ को कथित रूप से धर्म के चश्मे से देखती है। उन्हें लगा कि वो ऐसा कर देंगे तो हिंदूआंे का समर्थन मिल जाएगा लेकिन यहीं चूक हो गई। न सिर्फ देश के भीतर हालात बिगड गए बल्कि पडोसी देशों से रिश्तों में भी इसका असर पड सकता है।
भाजपा का असमिया हिंदू-बंगाली हिंदू वाला फार्मूला नहीं चल पाया। भाजपा के रणनीतिकारों को लगा कि असम हिंदू राज्य है यहां कोई विरोध नहीं होगा लेकिन विरोध असम से ही शुरू हो गया। उन्होंने यहां कुछ जगहों पर इनर लाइन परमिट को बढ़ाया। ऐसे में असम और त्रिपुरा में लोगों को लगने लगा कि दूसरी जगहों के बंगाली हिंदू उनकी जगहों में आ जाएंगे।
आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, घटता आयात-निर्यात, बंद होते कारखाने जैसे मामलों से ध्यान हटाने के लिए तीन तलाक, अनुच्छेद 370, एनआरसी, राम मंदिर, नागरिकता संशोधन क़ानून, जनसंख्या नियंत्रण कानून आदि के साथ मोदी सरकार अपने राजनीतिक अजेंडे को पूरा करने की ओर आगे बढ रही है। लेकिन, कुछ मामलों में जल्दबाजी की वजह से गडबड हो गई। ये सब जानते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून के तार एनआरसी से जुड़े हुए हैं। नागरिकता संशोधन क़ानून तो लागू हो गया है, अब इसका अगला कदम होगा एनआरसी। दरअसल, सरकार पडोसी देशों से लगी सीमाओं के राज्यों को चाक-चैबंद करना चाहती है खासकर एशियाई देशों को ताकि कारोबार बढाया जा सके। पूर्वोत्तर के राज्यों के ज़रिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ कारोबार बढ़ाने की मंशा भी तभी कारगर हो सकती है जहां यहां के हालात सामान्य हो। श्रीलंका से आए तमिल जो तमिलनाडु में बसे हैं उनके बारे में क़ानून में कुछ नहीं है। जिन देशों के नाम भारत ने क़ानून में लिए हैं उनमें अफ़ग़ानिस्तान है, जो भारत का मित्र है, यानी भारत सीधे सीधे कह रहा है कि वहां के सिख या हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है और हम उन्हें वापस लेने के लिए तैयार हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह चुके हैं कि वो किसी भी शरणार्थी को अपने यहां जगह नहीं देंगे। बांग्लादेश ने अपने लोगों की सूची मांगी है। अमेरिकी संसद और विदेशी मामलों की संसदीय समिति ने भी इस कानून पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ये भी देखने वाली बात होगी कि ऐसे इस्लामी मुल्क जिनके भारत के साथ रिश्तें मजबूत हुए हैं, वे इस कानून को लेकर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। घरेलू नीति का असर विदेश नीति पर भी पडता है लिहाजा, चाहे श्रीलंका हो या बांग्लादेश या फिर अमेरिका या इस्लामिक मुल्क, इन सभी की प्रतिक्रिया मायने रखेगी।
बहरहाल, पाकिस्तान में ही अल्पसंख्यक प्रताडित हैं तो अमेरिका की आव्रजन नीति भी निशाने पर आती रही है लेकिन ये सब तर्क अपनी जगह हैं। अभी जरूरत इस बात की है कि जल्द से जल्द इस मसले को लेकर तर्कसंगत हल निकाला जाए जिसमें किसी वर्ग विशेष का हित प्रभावित न हो।
मुस्ताअली बोहरा

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