कवि स्व.अशोक विश्वकर्मा के याद मे काव्य गोष्ठी संपन्न

0
35

जबलपुर-कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है और जब एक कवि समाज को अपने नजरिए से देखता है तो उससे उत्पन्न विचारों भावों को वह अपने शब्दों में पिरो कर प्रस्तुत करता है। उसकी यह प्रस्तुति समाज के लिए ना केवल उपयोगी होती है बल्कि लोगों को सहज रूप में है समाज की रीतियों कुरीतियों से वाकिफ करा देती है। ऐसे ही अपने समय के सशक्त हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय अशोक विश्वकर्मा जी की याद में साहित्यिक प्रकोष्ठ अधारताल द्वारा दिनांक 1/12/2019 को दोपहर तीन बजे से उनके निज निवास पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। समय के हस्ताक्षर शीर्षक से आयोजित काव्य गोष्ठी में विशिष्ट अतिथि श्री विष्णु प्रसाद साहू वाह स्वर्गीय श्री अशोक विश्वकर्मा जी की धर्मपत्नी श्रीमती सावित्री विश्वकर्मा की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। स्व.अशोक विश्वकर्मा जी के भाई श्री विजय विश्वकर्मा जी ने आयोजन को बड़ी तन्मयता के साथ पूरा किया। नगर के प्रतिष्ठित, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कवियों ने यहां अपनी प्रस्तुति दी।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है जो वक्त के साथ बदलता नहीं वह ठहर जाता है और पीछे छूट जाता है। यूं तो यह काव्य गोष्ठी, साहित्य लोगों के स्वस्थ मनोरंजन का भी एक साधन है। लेकिन इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन भर नहीं है। बल्कि मनोरंजन के माध्यम से समाज को अलख निरंजन की तरफ लेकर चलने का एक प्रयास है। एक कवि और साहित्यकार सदैव वक्त के साथ चलते हुए समाज पर अपनी पैनी दृष्टि बनाए रखता हैं। उस पर अपने शब्दों में अपनी रचनाओं की प्रस्तुति देता हैं। जिससे कि समाज के भीतर उपस्थित सारे गुण दोष उभर कर सामने आते हैं। कुछ ऐसे ही भावों से लबरेज यह काव्य गोष्ठी आदरणीय श्री संदीप सपन जी की अध्यक्षता में शुरू हुई मां सरस्वती के साथ स्व.अशोक विश्वकर्मा के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के बाद श्री विजय विश्वकर्मा जी द्वारा मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की गई। शायर राजकुमार सफर के सफल संचालन में गोष्ठी की शुरुआत शिव दिवेदी शंकाश की रचना से हुई।

अर्थी की लाई बीनकर उसको भूख मिटाते हमने देखा है।
दिवाली पर भी तेज हवा के उसको दुआ मांगते हमने देखा है।
बच्चों की पूरी की जिद की खातिर मजबूरी में। अभागी मां को दिया बुझा कर तेल चुराते हमने देखा है।
इसके बाद कवि दीपक तिवारी दिव्य ने अपनी रचना प्रस्तुत की।
अपने निहित स्वार्थ की खातिर,
क्या आजादी को तोलोगे।
अधिकार मिला है अभिव्यक्ति का,
तो क्या कुछ भी बोलोगे।
इसके बाद डॉ सलपनाथ यादव ने अपनी प्रस्तुति दी
अभी बहुत अंधेरा है दीपक जला दीजिए।
हर भटकते राही को रास्ता दिखा दीजिए।
एडवोकेट एमपी सिंह निकुंभ की इस रचना ने श्रोताओं की बहुत वाहवाही और तालियां बटोरी।
बसा बसा के शहर गांव ढूंढते रहे।
कुल्हाड़ी हाथ में लेकर लोग छांव ढूंढते रहे।
नदी तालाब के तटबंध तोड़ने वाले।
जब आया जलजला तो नाव ढूंढते रहे।
शायर और ग़ज़ल कार राजकुमार सफर ने भी अपनी प्रस्तुति दी
रिश्तो की बुनियाद में कच्चे धागे थे।
जब से ताना-बाना टूटा आया है कुछ ढीलापन।
श्री विजय विश्वकर्मा जी ने भी अपनी रचना प्रस्तुत की
लोकतंत्र की रामायण में हर चेहरा मुझे उदास मिला है।
हर कौशल्या के बेटे को आजीवन बनवास मिला है।
गोष्ठी जब अपने चरम पर पहुंची सब संदीप सपन जी ने अपनी प्रस्तुति दी अजब गजब अपने ढंगों से
तरह तरह अपने रंगों से। पल दो पल ही जिए बुलबुले
लेकिन भरे उमंगों से।
साहित्य प्रकोष्ठ के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में प्रति माह एक गोष्ठी करने का निर्णय लिया गया और उसके साथ ही स्वर्गीय अशोक विश्वकर्मा जी की याद में एक पुरस्कार शुरू करने की घोषणा भी की गई। जो किसी चयनित साहित्यकार को संस्था के द्वारा प्रदान किया जाएगा। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन श्रीमती सावित्री विश्वकर्मा के द्वारा किया गया। इस गोष्ठी को सफल बनाने में पूरे विश्वकर्मा परिवार का योगदान उल्लेखनीय रहा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here