मैं शहर जा रहा था…

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(कुमारी शालिनी रहांगडाले)
खुशीयो की फुवार, फूलों की फूलझंडी,
मानों दिवाली आज ही जली,
मैने नये दूल्हे की तरह सज़ा -धजा था,
मन उत्साहीत, प्रफुल्लित, आनंदित था,
मेरा मन शहर के जीस तौर -तरीकों मै उल्झा था,
जिसे देख कर गाँव में मन नहीं लगता था ।
जब रहा कुछ दिन शहर में,
तब लगा शहर से अच्छा मेरा गांव था ।
देखा शहर में, सब शिक्षित ही है,
एैसी शिक्षा का क्या, जिसमे इंसानियत ही नहीं
सब कहते हैं, गांव के अनपढ़ होते  हैं,
तब लगा मेरा, अनपढ गांव ही अच्छा था ।
देखा शहर में, प्रतियोगिता ही उत्तम है,
एैसी प्रतियोगिता का क्या, जिसमे संस्कार ही नही,
सब कहते हैं, गांव के पिछडे होते हैं,
तब लगा मेरा, पिछडा गांव ही अच्छा है ।
देखा शहर में, रोजगार तो बहुत है,
फिर भी कई लोगों के पेट में अनाज नहीं,
सब कहते हैं, गांव में बेरोजगारी हैं,
तब लगा मेरा, बेरोजगार गांव ही अच्छा है ।
देखा शहर में, उन्नति तो हो रही हैं,
एैसी उन्नति का क्या जिसमे प्यार, एकता नहीं,
सब कहते हैं, गांव मे गंवार होते हैं,
तब लगा मेरा, गंवार गांव ही अच्छा है ।
 वास्तव मैं शहर से अच्छा गांव हैं,
 जहाँ शांति है, लोग अपने आप में संतुष्ट हैं ।
  (शालिनी राहगडाले)
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